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हम कहां से चार्ज होते हैं और कहां डिस्चार्ज? एक लाइन में उत्तर दें? 

इसी से संबंधित कोई भजन की पंक्ति भी सुनाएं।

हम गुरु के पास सत्संग में चार्ज हो जाते हैं और संसार में डिस्चार्ज।

गुरु तेरा प्यार मुझे जब याद आता आ जाती मुझमें तब ही शक्ति सारी

है इंद्रियों की शक्तियां बाहर की ओर जो बाहर से तोड़ कर के अंदर में जोड़ लो, कर सकल द्वार बंद समाधि लगाके देख


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हमारी शक्तियां कहां खर्च होती हैं?

इनको हम कैसे बचा सकते हैं?

दूसरे पर ही निगाह है, उसी में हमारी सारी शक्तियां खर्च होती हैं

दूसरे को बदलना चाहते हैं, जिनसे सुख मिल रहा है या जिनसे दुख मिल रहा है, दोनों में ही हमारा मन बंध जाता है और उसी के सोच विचार में सब शक्तियां खर्च हो जाती हैं।

हमारे शक्तियां बढ़ती हैं : 

सत्संग में 

मुख की मौन से

गुरु के कार्य में लगने से

अपने सत्संग, भजन को बढ़ाने से

गुरु के ही वचनों में रहना और बांटने से

 

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माया क्या है? एक पंक्ति में उत्तर दें। इसी से संबंधित कोई भजन की पंक्ति सुनाएं।

गुरु के सिवाए कहीं भी जाते हैं वो सब माया है।

माया में तुम माया में तुम जाना नहीं गुरु छोड़ के, गुरु छोड़ के

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"कोई किसी को बदल नहीं सकता" यह कैसे साबित होता है?

इस व्यर्थ चेष्टा से अपने को रोकने के लिए गुरुजी के कौनसे वचन सहायक हैं?

खुद भगवान भी उतर कर आ जाए तो नहीं बदल सकता। अगर बदल सकता तो राम रावण की बुद्धि को बदल देते, कृष्ण दुर्योधन की बुद्धि को बदल देते।

हर एक की चाहत इतनी प्रबल है कि जब तक कोई खुद बदलना न चाहे कोई और उसकी नहीं बदल सकता।

हम क्यों दूसरे को बदलना चाहते हैं? क्या हमने किसी को खरीदा है, या किसी ने अपने को हमें बेचा है? 

क्या हम परफेक्ट हैं? क्या हम दूसरे के अनुसार खुद को बदल सकते हैं?

जब भगवान ने पेड़ पर दो पत्ती भी एक सी नहीं बनाई, दो बाल भी एक से नहीं, तो दो मत एक सी कैसी हो सकती हैं

सब परमात्मा के विधान के अनुसार चलेंगे मेरी इच्छा के अनुसार नहीं।

प्यार बनाए रखना है तो जो जैसा है उसको वैसे ही स्वीकार करो, संतुष्ट रहो और किसी से कुछ चाहो नहीं।

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"अपने कष्टों का वर्णन नहीं करो"

क्यूं?

गुरु जी के कौनसे वचन और सीख सहायक है जो हमें संभालते हैं।

क्योंकि जितना वर्णन करेंगे उतना की हमारे कष्ट बढ़ जाएंगे, और कोई फायदा नहीं होगा। कोई भी हमारे कष्टों का निवारण नहीं कर सकता, उल्टा हम चर्चा और हंसी का पात्र बन जाते हैं।

हमारे कष्ट जो हैं लगते हैं, वो हमारे ही कर्मों का हिसाब है, उसको हमें सहना ही है, और जितना शांत होकर सहेंगे, उतना जल्दी कट जाएंगे। गुरु के साथ सहने नहीं पड़ते क्योंकि गुरु उसमें भी भलाई देखने की दृष्टि देते हैं। 

सब कुछ होता है।

मुझे तो परमात्मा ने सुख अधिक दिये हैं।

परमात्मा ने बहुत कम कर के दिया है, इससे भी अधिक कष्ट होता तो मैं क्या करती

कष्ट अच्छे हैं, हमें साफ, पाक करते हैं, परमात्मा के करीब लाते हैं।

सब दिन होत न एक समान - सुख है तो दुख भी जरूर आयेगा, लेकिन हम हर बात से भलाई ढूंढ लें तो दुख में भी सुख मना सकते हैं।

अपनी सहनशक्ति और धीरजता को गुरु के साथ बढ़ाएं

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