जीवन में सत्संग का क्या महत्व है? कोई सूत्र बताएं जो सत्संग की महत्ता बताए।
हमें सत्संग में कैसे बैठना चाहिए? कोई तीन आवश्यक नियम बताएं जो हमें मानने हैं सत्संग में बैठने के लिए?
जीवन का उद्देश्य है शांति और परमानन्द की प्राप्ति जो मनुष्य ने खो दी क्योंकि अपने को जानता नहीं। अपने आप को ही भूल गया, अपने को शरीर समझ कर दुखी सुखी होता रहा और अपने को परमात्मा से दूर कर लिया। अब वापिस अपने को परमात्मा से मिलाने का अवसर मिला, सच्चा गुरु मिला जो यह सच बताता है कि मैं यह शरीर नहीं हूं, आत्मा हूं, परमात्मा का ही अंश हुबुह वैसा। क्योंकि यह हम।भूल चुके हैं, केवल सत्संग ही माध्यम है इस सच को बार बार सुनने का, उसको समझने का और उसमें स्थित हो जाने का।
सत्संग ही जीवन है।।
बिनु सत्संग विवेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
1. सत्संग में सीधा बैठें, स्वांस सीधा चले, टेढ़ा मेड़ा होकर नहीं बैठो, टेक लगाकर नहीं बैठो, आसान उचित हो, बहुत आरामदायक भी नहीं हो कि नींद आ जाए और बहुत कष्टदायक भी नहीं जो बैठा न जाए
2. इंद्रियों और मन को वश में रखकर बैठें - आँखें केवल गुरु को ही देखें, इधर उधर नहीं, एक कोना लेकर बैठें जिससे हमारा ध्यान नहीं भटके, हाथ पांव नहीं हिलाएं, मन में भी कुछ और नहीं चले, गुरु के वचनों में ही पूरा ध्यान हो।
3. सत्संग में 5 मिनट पहले से आकर बैठें जिससे कि हमारी इन्द्रियां और मन एकाग्रचित हो सकें, और गुरु का एक एक शब्द ध्यान से सुन सकें।
4. सत्संग हमारा मानसिक भोजन है, जिस तरह खाना ना खाने पर शरीर दुर्बलता महसूस करता है, इसी तरह सत्संग के अभाव से हम मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं और सुख दुख में डूब जाते हैं, हमारे विकार और मन हमपर हावी हो जाता है। इसलिए सत्संग निरंतरता से लें।
5. सत्संग नियम और टाइम से लेने पर ही हमारे भीतर का रस उपजता है, निरंतरता से ही रस की उपज होती है, अगर समय से नहीं बैठते तो गुरु की बातों को कनेक्ट नहीं कर पाते, चंचल मन और इंद्रियों को स्थिर होने में समय लगता है इसलिए कितने वचन हमसे छूट जाते हैं। नेम और टेम से ही हमारा मन रमने लगता है, सधने लगता है, गुरु राजी होता है और उनकी कृपा बरसती है।
मनमुख नहीं गुरुमुख बनें। इसका क्या अर्थ है। इसी संदर्भ में कोई भजन की पंक्ति सुनाएं।
मन के कहे अनुसार नहीं चलें। मन हमारे ख्याल हैं, past, future के जो हमें खुश नहीं रहने देते, मन गंवार है जो शरीरों का आधार ही लेता है, डराता है, विषय विकारों में लेकर जाता है, दूसरे में ही रहता है, नीचे गिराने की बातें लाता है। नेगेटिव दिखता है, बेसिर पैर की बातें लाता है, उसकी बात मानकर हम अपना नुकसान करते हैं।
गुरुमुख यानी जिसकी निगाह केवल गुरु की और है, केवल गुरु की समझ से चलता है, इधर उधर नहीं देखता, किसी की नहीं सुनता। My master is always right।
गुरु हमें निराधार बनाता है, मन को शरीरों से हटाकर उस शक्ति पर लगता है जिसकी वजह से सब शरीर चल रहे हैं, हर एक से मन मिलाकर चलना सिखाता है, मन को मोड़ना और परमात्मा से जोड़ना सिखाता है जिससे मन शांत होने लगता है।
मन मति डुबोए गुरु मति तारे, तू चलना मेरे मन गुरु के इशारे
"Present में जीयो" इससे हम क्या समझते हैं?
इसी संदर्भ में कोई दृष्टांत, भजन या प्रकरण सुनाएं।
अभी का पल जीवित हैं, यही सबसे बड़ी खुशी है। इस समय तो परमात्मा ने स्वांस दी हैं , तो हमारा यह पल कितनाअच्छा है। परमात्मा की तरफ से गिफ्ट मिला है यह पल।
जिसका आज अच्छा नहीं उसका भविष्य कभी अच्छा हो नहीं सकता है। आज भी जो भी है, जैसा भी है उसमें खुश हैं। जिसको आज में जीना आ गया, वो कल भी अच्छे से जी लेगा।
एक वजीर को फांसी की सजा मिली, सुबह सुबह राजा की दृष्टि में कोई दोष हो गया होगा। उसने ऐलान किया कि 6 बजे इसको फांसी लगानी है, उसको अंदर से लगा कि अब तो यह दुखी होगा। 4 बजे उसने वहां एक आदमी भेजा, देखो इसकी क्या हालत है, उसकी बीवी एक तरफ तो रही होगी, बच्चे एक तरफ रो रहे होंगे, वो खुद तो रहा होगा मुझको क्यों फांसी मिल रही है, परेशान होगा बेचारा, वहां जाकर देखा तो महफिल लगी हुई थी, सितार बज रही थी, डांस हो रहा था, गाना हो रहा था, पार्टी हो रही थी, लोगों ने बोला भाई पता है तुमको आज फांसी मिलने वाली है इस वजीर को, वजीर आ गया, वजीर ने कहा हां मालूम है, पूछा मालूम है तुम्हे 6 बजे फांसी मिलनी है, बोला हां बिल्कुल मालूम है, बोला अभी तुम यह सब शाद नामा मना रहे हैं, रोज खुशियां कर रहें हैं, अभी 4 बज रहे हैं, बचा कितना है बस 2 घंटा। बोला 2 घंटा भी है ना, जीवन के दो घंटे भी अगर मेरे पास हैं तो मैं उसे खुशी से क्यों नहीं गुजारूं, उसके लिए बैठ कर अभी से क्यूं रोयें, 6 बजे फांसी मिलनी है, 6 बजे फांसी मिलनी है। राजा को जाकर बताया गया कि वजीर तो बड़ी मौज में है, उसके यहां तो दावत हो रही है, लोग खा रहे हैं, महफिल लगी पड़ी है। राजा गया उसका दर्शन करने के लिए, उसके पास पहुंच गया। बोला बेटा जिसको जीने की कला आ गई उसको तो मैं भी नहीं मार सकता। जब तू मृत्यु से 2 घंटा पहले तक मौज कर रहा है तुझे कौन मारेगा।
"दृष्टा बनो"
इसका क्या अर्थ है?
No reaction
जैसे पिक्चर देखते हैं, उसकी मौज लेते हैं, विलेन भी आता है उसके रोल की तारीफ करते हैं, ऐसे ही हमारे जीवन की पिक्चर चल रही है, कोई टीका टिप्पणी नहीं करें, उसमें दुखी नहीं होंगे, उसमें अटकेंगे नहीं। और अपने रोल को अच्छे से निभाएंगे, गुरु की सीख पर चल कर।
सब कुछ बदल जाएगा, फिर उसके बारे में सोच कर, या परेशान होकर या चर्चा करके, हमको क्या मिलेगा? सब हो रहा है, बना पड़ा है, सिर्फ उसको देखें।