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हम जगत का संग करते हैं तो वह भी अंदर जाता है और गुरु का संग करते हैं तो वह भी अंदर जाता है,  जगत के संग से और गुरु के संग से हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? अपने अनुभव से अलग अलग एक एक फर्क बताएं।

गुरु के साथ we rise in love, हमारा मानसिक उत्थान होता है, हमारे विकार नष्ट होते हैं, अंतर्मन की सफाई होती है, मन को शांति हासिल होती है, ठंडक मिलती है, हमारे दुखी करने वाले खयाल हर जाते हैं, सुलझाव आ जाता है, हमारे जीवन का मकसद पूरा होता है, परमार्थ की बात करते हैं, उदासी, खालीपन सब खत्म होता है, भरपूर्ता आती है

जगत में we fall in love - हम मोह, आसक्ति, में गिरते हैं, इच्छाएं पनपती हैं, संकल्प विकल्प बढ़ती हैं, मर्यादाएं याद आती हैं, चिंता बढ़ती है, हम उनमें और फंसते जाते हैं, विकारों की पूर्ति होती है, शरीर के सुखों की बात करते हैं, अर्थ की बात करते हैं, असंतोष बढ़ता है।

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"As the company so the color"

इस सूत्र से हम क्या सीखते हैं? इसी से संबंधित कोई और सूत्र बताएं। कोई दृष्टांत इसी से संबंधित सुनाएं

 

हम जिसका संग करते हैं हम वैसे ही हो जाते हैं।

तोते ने संत का संग किया तो स्वागतम स्वागतम बोला, दूसरे तोते ने डाकू का संग किया तो मारो काटो सीख गया

अपने flock में रहो

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"कैसेट से या किसी प्रेमी से या बनी की रिकॉर्डिंग सुन लें पर गुरु के संग का असर अलग है"

गुरु का संग कहां मिलता है? कोई भजन की पंक्ति इसी से संबंधित सुनाएं।

इसी संदर्भ में कोई दृष्टांत या प्रकरण सुनाएं।

गुरु का संग सत्संग में मिलता है

ओरे ज्ञान मिले गुरु के मुख से, गुरु मिले सत्संग में सत्संग मिले प्रेम लगन से कोई जाने ना

सिकंदर वजीर प्रकरण

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पांच विषय विष के समान छोड़ दो? यह पांच विषय कौनसे हैं? इन्हें क्यों छोड़ दें? 

हमारे विषय रस कैसे छूटेंगे? इसका उत्तर किसी दृष्टांत या प्रकरण से दें।

शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध

हम इन विषय रस को लेते लेते कमजोर हो जाते हैं, इनके गुलाम हो जाता हैं, इनके बिना रह नहीं पाते, शक्तिहीन हो जाते हैं। यह भोग हमें ही भोग जाते हैं।

जब यह रस आए तो वो रस न भाए। गुरु के संग हमारे सब रस छूटते जाते हैं, कोई इच्छा नहीं रहती। 

मीरा को अकबर ने गिफ्ट भेजी थाल सजा कर, मीरा ने बोला तुमने मेरी इज्जत की मेरे लिए इतना भाव रखा, बहुत अच्छी बात है,  पर मेरे को इनकी आवश्यकता नहीं है, तो मैं यह सब तुम्हारा रखकर क्या करुंगी। तुम्हारी भावनाओं की कदर करती हूं लेकिन इन चीजों की आवश्यकता नहीं, उनकी भेंट अस्वीकार कर दी। अकबर कहने लगा राजा की भेंट को अस्वीकार किया, तानसेन ने उसको बोला वो आपसे भी ऊपर है, वो आपकी चीज भी अस्वीकार कर सकती है।

जो मेरे कृष्ण का आदेश होता है मैं वही कार्य करती हूं, उसके आगे किसी के आदेश को नहीं मानती

कबीर को सोने की पालकी गई थी, कि राजदरबार में आओ गाने के लिए, सत्संग करने के लिए, बेचारा पढ़कर रोने लगा, है तो तुम्हारा ऑफर बहुत अच्छा पर क्या करूं तेरी वैकुंठ को जहां साध संगत नहीं होए। साध संगत में जो सुख है वो इस राज्य से तुम्हारे वैभव से हर चीज से बड़ा है, उसको छोड़कर मैं तुम्हारे तुच्छ सुखों की और क्यूं जाऊं